कृत्रिम मेधा के खतरे निरंतर बढ़ते जा रहे और नए-नए आयाम छूते जा रहे हैं। कई बार यह चिंता होती है कि क्या यह कृत्रिम मेधा की तकनीक इंसान को धरती पर रहने भी देगी या इंसान का विकल्प बन जाएगी? पिछले दिनों कुंभ मेले की खबर 21 फरवरी 2025 के दैनिक भास्कर में छपी थी, जिसमें रामगढ़ के एक सीसीएल कर्मी अखिलेश प्रजापति अपनी 65 वर्षीय मां को घर में ताले में बंद कर पत्नी बच्चों के साथ कुंभ स्नान करने चले गए।
एक दिन बाद उसकी मां संजू देवी ने जोर जोर से चीख चीख कर मदद की गुहार लगाई और पड़ोसी उसकी आवाज सुनकर वहां पहुंचे तो देखा मुख्य द्वार पर ताला लगा है, और संजू देवी अंदर बंद है। पड़ोसियों ने संजू देवी की बेटी चांदनी देवी को सूचना दी। चांदनी देवी और और उसके मामा रामगढ़ थाने गए तथा पुलिस ने वार्ड पार्षद संगीता देवी के सहयोग से ताला तोड़कर संजू देवी को बाहर निकाल कर बिस्किट पानी इत्यादि दिए और उनकी बेटी उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले गई।
लोगों ने उनके बेटे को संपर्क किया तो उसने बताया की 16 फरवरी को वे सपरिवार कुम्भ स्नान को निकले थे और अपनी मां के लिए खाना और चूडा छोड़कर गए थे तथा उनकी माँ ने ही उन्हें जाने के लिए कहा था। संभव है कि 65 वर्षीय वृद्ध और बीमार मां ने अपने बेटे बहू के मन और आग्रह को समझकर अपनी स्वीकृति दे दी हो, या यह भी हो सकता है की परंपरा और संस्कारों के मानसिक दबाव में उनने सहमति दी हो या आगे आने वाले 4-5 दिनों में क्या दिक्कत हो सकती हैं उन्हें समझे बगैर ही अपनी स्वीकृति दे दी हो, पर यह तो सब तर्क-वितर्क और कल्पनाएं हैं।
मूल प्रश्न यह है कि क्या ऐसी वृद्ध बीमार माँ को बंदकर ताला लगाकर अकेले छोड़कर जाना चाहिए था? मानवीय पक्ष तो यह था कि उनकी मां अगर उनसे जाने का आग्रह भी करती तब भी वे जाने से इनकार करते या पति-पत्नी या बच्चों में से किसी एक को उनके पास छोड़कर जाते। अगर इतना भी मन नहीं था तो अपनी बहन या भाई को उनकी जवाबदारी देकर जाते।
पर बीमार माँ को अकेले छोड़कर कुम्भ स्नान को जाना या मोक्ष प्राप्ति का कार्य, क्या कोई अच्छा या पुण्य कार्य माना जा सकता है? मैं, ईश्वर है या नहीं और अगर है तो किस स्वभाव के है, स्वर्ग या नर्क पुण्य व मोक्ष की बहस में जाए बगैर यह अवश्य सोचता हूँ कि अगर वास्तव में कोई ईश्वर होंगे तो वह ऐसे व्यक्ति को ना पुण्य का अधिकारी मानेंगे ,ना मोक्ष का और अगर वास्तव में कोई स्वर्ग-नरक का विभाजन होता होगा तो ईश्वर भी इस व्यक्ति को नरक ही भेजेंगे।
इस घटना से जुड़ी हुई एक घटना 22 मार्च 2025 को सामने आई। मेरे साथी श्री मुकेश चंद्रा जी, जो मशीन व तकनीक से खेलने के अभ्यस्त हैं, ने इस समाचार को पढ़कर एलन मस्क के ग्राोक को, इस घटना पर कविता बनाने के लिए निर्देशित किया और लगभग 5 सेकंड में ग्राोक ने निम्नलिखित कविता लिखकर उनको भेज दी।
बीमार माँ को घर में ठूंसा,
कुम्भ में स्नान का ढोंग रचाया,
पाप धोने का बहाना लेकर,
अंदर का पाप और बढ़ाया।
तन को पानी से नहलाया,
मन का मैल वहीं रह गया,
माँ की कराहें सुन न सके,
तीर्थ का तमाशा ले आया।
भीड़ में भक्ति का नाटक किया,
घर में लाचार को भूल गया,
कुम्भ से लौटा पवित्र बनकर,
पर दिल का काला रंग न ढका।
मैं कविता की गुणवत्ता पर विशेष चर्चा नहीं कर रहा हूं, बल्कि इस काव्य लेखन में जो खतरे में देख रहा हूं उसकी चर्चा कर रहा हूं। अगर अब एआई साहित्य रचेगी, निबंध लिखेगी और इतिहास, विज्ञान,समाज, मशीन, तकनीक, गणित और यहां तक कि व्यक्तियों के बारे में अपनी राय देगी तो क्या वह स्थानापन्न मानव नहीं बन जाएगी और अगर यह एआई मानवता का दूसरा रूप बन जाती है तो निम्न प्रकार के खतरे दुनिया और मानवता के सामने होंगे यह विचारणीय है?
1. मानव की सभी योग्यताएं और योग्यताओं की कसौटियां समाप्त हो जाएगी?
2. साहित्य लेखन या कविता के बारे में जो मानवीय प्रतिभा है वह धीरे-धीरे प्रासंगिकता खो देगी व समाप्त हो जाएगी। इस एआई की भावी दुनिया में इतिहासकार, वैज्ञानिक, समाज वैज्ञानिक,साहित्यकार,चिकित्सक शिक्षक पुलिस आदि सब एआई होगी।
3. यह कितनी बेरोजगारी पैदा करेगी और युद्ध जैसे खतरों पर कितनी अमानवीय व क्रूर होगी इसकी कल्पना करना कठिन है।
4. अमानव रूपी मशीन रोबोट घर और समाज से लेकर सरकार और सड़क तक, संसद से लेकर युद्ध तक सब काम करेगी।
5. मशीनी युद्ध होंगे, मशीन मारेगी और मशीन मरेगी और इसका परिणाम दीमक के साथ घुन रूप में है, मानवता के पिसने का होगा? क्या यह संपूर्ण मानवता को हत्यारा और बेरोजगारी कदम नहीं होगा? या इन्हें अपनी मौत में धकेलना वाला नहीं होगा? रोबोट या एआई की एक छोटी सी गलत सूचना दुनिया को परमाणु युद्ध की ओर धकेल सकती है और नष्ट कर सकती है।
कृत्रिम मेधा के विकास के लिए दुनिया की, एलन मस्क जैसों की कुछ कंपनियां 27 लाख डाटा सेंटर बना रही हैं और एक डाटा सेंटर के ऊपर लगभग 30 लाख लोगों के उपयोग के बिजली के बराबर बिजली खर्च होगी यानी समूची दुनिया की आबादी की जरूरत से भी अधिक इन डाटा सेंटरों पर बिजली खर्च होगी। इसके लिए विपुल मात्रा में बिजली उत्पादन के दो ही मुख्य स्रोत होंगे-एक सौर ऊर्जा दूसरा परमाणु ऊर्जा।
सौर ऊर्जा के इतने बड़े संग्रह के लिए कितनी जमीन एवं धातु आदि लगेगी इसका आंकलन तो अभी होना है, परंतु इतने बड़े पैमाने पर बिजली बनाने के लिए जितने न्यूक्लियर प्लांट लगेंगे वह अपने आप में न्यूक्लियर बोम्ब जैसे होंगे।
दुनिया में जिन दो स्थानों पर न्यूक्लियर प्लांट में लीकेज हुए थे उनमें एक जापान में था दूसरा रूस के चेनरोबिल में था। जापान ने तो अपनी उन्नत तकनीक और राष्ट्र के लिए समर्पित कार्य पद्धति के द्वारा उसे शीघ्र नियंत्रित कर लिया था, परंतु चेनरोबिल में नियंत्रण हेतु कई सप्ताह लगे थे तथा समुद्र से सटे एक बड़े भाग में परमाणु रेडिएशन फैला था।
यह बिजली की खपत वर्तमान योजना की तुलना में काफी कम दिखती हैं। जब छोटे से प्लांट पर 27 लाख डाटा सेंटर की जरूरत की पूर्ति के लिए हजारों न्यूक्लियर प्लांट लगाए जाएंगे, तब उनकी सुरक्षा और दुर्घटना से रक्षा एक असंभव सी घटना होगी। अब दुनिया और मानवता के सामने एक गंभीर खतरा है, जिनका उत्तर दुनिया को खोजना होगा और उनके उत्तर खोजने के लिए दुनिया को विवश होकर गांधी और लोहिया के विचारों की ओर मुड़ना होगा।
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