छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है, जो पत्रकारिता की सच्चाई, जोखिम और सिस्टम की खामोशी तीनों को एक साथ बेनकाब करती है।
गरियाबंद की पैरई नदी के पितईबंद रेत घाट पर जब कुछ पत्रकार अवैध खनन की हकीकत दिखाने कैमरा लेकर पहुंचे, तब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि लौटना मुश्किल हो जाएगा। खबर की खोज में निकले थे, लेकिन खुद ही खबर बन गए।
पहले से सूचना दी गई थी, फिर भी अकेले छोड़ दिया गया
पत्रकारों ने प्रशासन को सूचना दी थी। खनिज विभाग को बताया गया था कि हम अवैध रेत खनन पर रिपोर्टिंग करने जा रहे हैं। उम्मीद थी कि कोई अफसर साथ चलेगा, सुरक्षा होगी। लेकिन मौके पर न कोई अधिकारी मिला, न कोई पुलिस। जो मिला वो था – माफिया का खौफ और गुंडों की गैंग।
लाठी-डंडों से हमला, कैमरा-माइक छिना और चली गोली
जैसे ही पत्रकार मौके पर पहुंचे, कुछ ही देर में रेत माफिया के गुर्गे वहां पहुंचे। हथियारों से लैस गुंडों ने घेरकर हमला कर दिया। लाठी-डंडों से पीटा गया, कैमरे और माइक छीने गए, दो राउंड फायरिंग हुई।
घटना से इलाके में सनसनी फैल गई। कुछ पत्रकारों ने जान बचाने के लिए दौड़ लगाई, एक पत्रकार ने हिम्मत दिखाकर मोबाइल से वीडियो बना लिया। वही वीडियो अब वायरल हो गया है और प्रशासन की नींद खुली है।
सड़क पर उतरे पत्रकार, माइक और ID रखकर विरोध
इस हमले के बाद गरियाबंद में पत्रकारों का गुस्सा फूट पड़ा। सड़क पर माइक और प्रेस ID रखकर विरोध प्रदर्शन किया गया। मांग की गई कि दोषियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए और पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
कुछ पत्रकारों ने आरोप लगाया कि खनिज विभाग ने माफिया को पहले ही खबर कर दी थी, तभी वे घात लगाकर बैठे थे। सवाल ये भी है कि जब प्रशासन को पहले ही सूचना दी गई थी, तो मौके पर सुरक्षा बल क्यों नहीं भेजा गया?
क्या लोकतंत्र की नींव हिल रही है?
ये हमला केवल कुछ पत्रकारों पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला है। जब माफिया खुलेआम गोलियां चला सकता है और सिस्टम मौन रह जाता है, तो यह खतरनाक संकेत है।
पत्रकार हर दिन अपनी जान जोखिम में डालकर सच्चाई सामने लाते हैं। लेकिन अगर सिस्टम उन्हें बेसहारा छोड़ दे, तो आने वाले समय में सच्चाई बोलने वाले चुप हो जाएंगे – और यही माफिया चाहता है।
अब सवाल सरकार से है…
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क्या माफिया अब कानून से ऊपर हो चुका है?
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क्या पत्रकारों को सुरक्षा देना प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं?
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कब तक खनन माफिया पुलिस और सिस्टम को ठेंगा दिखाता रहेगा?
जरूरत है एक कड़े संदेश की। दोषियों को तुरंत गिरफ्तार किया जाए। पत्रकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए। वरना आने वाला कल अंधेरे में होगा – जहां सच बोलने से पहले लोग अपनी जान का हिसाब लगाने लगेंगे।
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