सरकारी नौकरियों के लिए होने वाला भ्रष्टाचार किसी से छिपा नहीं है, लेकिन जब कोई बेटा अपनी जिंदा मां को मरा घोषित कर नौकरी पा जाए, तो यह न सिर्फ कानून का मजाक है, बल्कि समाजिक मूल्यों की गिरावट का भी प्रमाण है। मध्यप्रदेश के रीवा जिले से सामने आया यह मामला केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि एक पूरे गिरोह की करतूत है जो अनुकंपा नियुक्ति प्रणाली को ध्वस्त करने में लगा हुआ है।
घटना का विश्लेषण:
रीवा जिले में हाल ही में एक महिला जिला कार्यालय पहुंची, जबकि रिकॉर्ड में वह मृत घोषित हो चुकी थी। जब महिला ने अधिकारियों को बताया कि वह जीवित है, तब जांच शुरू हुई और एक चौंकाने वाला सच सामने आया — महिला के बेटे ने एक फर्जीवाड़ा गिरोह की मदद से मां की झूठी मृत्यु का प्रमाण पत्र बनवाया और 10 लाख रुपये की डील के तहत सरकारी नौकरी हासिल कर ली।
जांच में खुलासा हुआ कि यह कोई अकेला मामला नहीं है। अब तक ऐसे 6 से अधिक प्रकरण सामने आ चुके हैं, जिनमें जिंदा लोगों को मरा दिखाकर उनके रिश्तेदारों को अनुकंपा नियुक्ति दी गई है। इस पूरे नेटवर्क में पंचायत सचिव, जनपद कर्मी, विभागीय बाबू और कुछ प्रभावशाली दलाल शामिल हैं।
फर्जीवाड़े की प्रक्रिया:
यह गिरोह पहले ऐसे परिवारों की पहचान करता है जिनमें सरकारी कर्मचारी से जुड़े लोग हैं। फिर जीवित परिजन को मृत बताकर, फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र, सेवा पुस्तिका में बदलाव और आधार जैसे दस्तावेजों में हेरफेर किया जाता है। पूरे सौदे में 8-10 लाख रुपये लिए जाते हैं, जिसमें से हिस्सा विभिन्न कर्मचारियों को भी जाता है ताकि काम बिना रोक-टोक पूरा हो सके।
प्रशासनिक लापरवाही या मिलीभगत?:
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने स्तरों पर दस्तावेजों की जांच के बावजूद यह फर्जीवाड़ा कैसे हो गया? क्या जिम्मेदार अधिकारी लापरवाह थे या जानबूझकर आंखें मूंदे हुए थे? इस घोटाले ने साफ कर दिया है कि अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता का घोर अभाव है और व्यवस्था में कहीं न कहीं सड़ा हुआ तंत्र काम कर रहा है।
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