जेल के जले साहब की हरिकथा

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जेल के जले साहब की हरिकथा

अजयभान सिंह 

यों अपन शेरो-शायरी, अदबो-अशआर से बहुत ताल्लुक नहीं रखते। लेकिन करें तो करें क्या? नामुराद किस्सा ही ऐसा गजब है कि बरबस जाँ निसार अख्तर का ये शेर जेहन में फुदकने लगा।

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें

कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं।।

इस कहानी के ‘न्यूक्लियस’, ‘दंड-शक्ति’ यानी ‘लाठी-गोली’ से लैस एक साहब हैं। ‘न्यूक्लियस’ होने तक तो ठीक है, कम से कम अपनी सीमाओं को तो जानते हैं। लेकिन गड़बड़ तब होती है जब साहब अक्सर बहुत महीन होने की कोशिश में ‘न्यूक्लियस’ से ‘फोटोन’ हो जाते हैं और उनकी गाड़ी ट्रैक से उतर जाती है। यानी ‘मेनस्ट्रीम’ से ‘फ्रिंज’ तक की यात्रा में साहब की ‘गुरूता’ खेत हो चुकी होती है और मान प्रतिष्ठा का फालूदा बन चुका होता है। सीने में नश्तर से दर्द को भुलाने में बड़ा वक़्त जाया होता है सो अलग।  

कुछ समझ में आया ? नहीं न ? मैं भी काफी चक्कर खाने के बाद समझ पाया। तो हुआ यूं कि साहब आजकल जेल से शदीद खफा बताए जाते हैं। हों भी क्यों न ? साहब खाकीधारी जीवों के बहुत बड़े ओहदेदार हैं। रुतबा ऐसा कि उनकी लाठी के आगे भैंस खुद ही बीन बजाने लगती है और फटाफट काले अक्षरों को भी पहचानने लगती है। आजकल पूरे रौबदाब में हैं। नए निज़ाम में हावी पुराने खलीफाओं की नज़रे-इनायत से इन दंड नायक महाभाग के चमड़े के सिक्के भी दौड़ रहे हैं और असली सिक्के अपनी खाल बचाते फिर रहे हैं। 

भगवान के मंगलाचरण जैसी इतनी बड़ी भूमिका बनाने का आशय सिर्फ इतना ही जताना और बताना था कि साहब बहुत बड़े वाले हैं। 

ख़ैर, अब किस्से का रुख करते हैं। अपने खबरी ने लगभग हांफते हुए आधी रात को मुझे जगाकर बताया कि साहब जेल से इतने रुष्ट क्यों हैं? गरीब आदमी की कारा-कुंठायें तो समझ में आती हैं, लेकिन खाकी-नायक भला क्यों खीझ रहे हैं? 

"खबर पक्की है" खबरी ने कान में जोर से कहा। अपने राम भौंचक, कहा कि "हुआ क्या है?"  

खबरी थोड़ा संयत होकर बताने लगा कि एक बार जेल में जले साहब को जेल की लपटों ने फिर से झुलसा दिया है। अब कुल्फी भी फूंक-फूंक खा रहे हैं। नहीं समझे न ? मैं भी नहीं समझा था। अपन ने खबरी से कहा अमां यार पहेली न बुझाओ, तफसील से सुनाओ। 

खबरी फिर बताने लगा कि, दरअसल हुआ यूं है कि हाल के दिनों में खाकी महकमे के ‘दण्डनायकों’ ने एक ‘नव्य-सुंदरी’ को महज इसलिए धर लिया क्योंकि वो बेचारी मनुष्यों को ‘आकाश-गमन’ कराने में समर्थ, ‘आह्लादकारी’, 'आनंदकर-बूटी' दिया करती थी। ऐसी ‘लोकहित-रता’, ‘विश्व-हितकारिणी’, ‘परम-सुंदरी-षोडशी’ को बंदी बना लेना कहां का न्याय हुआ भला ? 

‘दण्डनायक-महाभाग’ यानी इस कहानी के ‘न्यूक्लियस’ साहब के अधीनस्थों को उस ‘परोपकारिणी-बाला’ ने ऐसे तमाम लोगों के नाम बताए जिनके ‘आकाशगमन’ और ‘आनंदवर्धन’ की व्यवस्था उसने की थी। बस फिर क्या था साहब के मस्तिष्क में विराजमान ‘सुपर-कंप्यूटर’ अपनी पूरी क्षमता से दौड़ने लगा। उन्होंने दारोगा के समतुल्य एक अधिकारी को तुरंत जेल में बंद एक शराब माफिया अथवा ‘मदिरा-दस्यु’ को धमकाकर तीस कोटि मुद्राओं का प्रबंध करने का आदेश दिया।

बताते हैं कि,’नव्य-बाला’ के इस ‘मदिरा-दस्यु’ से बड़े मधुर, ‘आकाशगामी’ संबंध है। बस साहब यहीं पर चूक कर गए। कारागार में कुछ महीने पहले हुई  अपनी फजीहत को भी वह भूल गए। 

खबरी के अनुसार ‘मदिरा-दस्यु’ ने उस ‘दंड-अधिकारी’ को पहले तो खूब खरी-खोटी सुनाई। फिर कहा; "जाकर बोल देना अपने ‘दंड-स्वामी’ को कि तीस कोटि तो छोड़ो तीन मुद्राएं भी नहीं मिल पाएंगी। रही बात ‘नव्य-बाला’ के साथ ‘आकाशगमन’ संबंधी चलचित्रों की तो कान खोल के सुन लो, मेरे पास उसी ‘षोडशी’ के साथ बड़े-बड़े ‘दण्डनायकों’ के चलचित्र पहले से ही विद्यमान हैं। यह सुनने के बाद पहले तो ‘साहब’ सन्निपात में आ गए। वैद्यकीय परामर्श के बाद किसी तरह चैतन्य हुए हैं तो बस ‘कारा’ वाले ‘मदिरा-दस्यु’ की बातों को सोच-सोच कर दाह से कराह रहे हैं। 

परिजन, मित्र, सेवक और प्रहरी सब साहब को लेकर चिंतित चल रहे हैं। उनको जेल नामक ‘बंदी-गृह’ से दूर ही रहने की सलाह दे रहे हैं। ज्योतिषियों ने पहले से ही बता रखा है कि ‘कालचक्र’ विपरीत है. ‘कालपुरुष’ की कुंडली में शनि महाराज कारागृह के कारक 12 वें घर यानि मीन राशि में बैठे हैं। ऐसे शनि जिसको भी देखेंगे, ‘कारा’ संबंधी कष्ट देंगे ही। जेल नाम की बला से साहब को पहले भी बड़ा अपयश और कष्ट मिल चुका है। 

 अपन ने चौंककर खबरी से पूछा। अमां यार अब ये पहले कौन सी चोट खा ली साहब ने। खबरी ने बताया कि इसी तरह कुछ महीने पहले साहब को जाने क्या सूझा कि पहुंच गए जेल। वहां बंदी एक ‘कोल-माफिया’ यानी ‘कोकिल-दस्यु’ को लगे धमकाने।

बात-बात में बात बिगड़ गई और ‘हट्टे-कट्टे’ ‘कोकिल-दस्यु’ के साथ साहब की जूतम-पैजार हो ली। और तो और उसने उल्टे साहब पर ही आरोप जड़ दिया कि वो प्रदेश के पुराने मुखिया को फंसाने के लिए लगातार धमका रहे हैं। इसके बाद जो अपयश हुआ सो तो हुआ ही। साहब एक सियासी चक्रव्यूह में उलझ गए सो अलग। 

मेरी जिज्ञासा अब आसमान पर थी। खबरी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि, फिर ‘अरिष्ट-निवारण’ के लिए साहब ने ‘2005-चालीसा’ का पाठ किया और उसके पीर शेख साहिब से मदद की गुहार लगाई।

शेख साहिब ने अपने ‘मुर्शिद’ मुहम्मद बाखबर की सहायता से सुरम्य ‘गुलशन-वाटिका’ के पचासवें पड़ाव में पुराने मुखिया के साथ साहब की संधि करवाई। संधि में तय हुआ कि साहब छोटे-मोटे मुल्जिमों को 164 के बयानों से निपटाकर पुराने मुखिया पर किसी भी प्रकरण में आंच नहीं आने देंगे। 

खबरी ने आगे कहा इसलिए साहब ने पुराने मुखिया के दुलारे पुत्र के खिलाफ मामला कायम तो किया लेकिन उसको कभी पूछताछ के लिए एक नोटिस तक नहीं दिया।

मैंने कहा इसमें कौन सी खास बात है? खबरी फिर बोला, खास बात है। खास बात ये है कि इसी शिकायत की बुनियाद पर दिल्ली से आई एक संस्था के अधिकारियों ने पुराने मुखिया के पुत्र को बंदी बनाकर जेल में बंद कर रखा है।  

मैं सोच में पड़ गया तब तक खबरी फिर मुझे झकझोड़ते हुए कहा, “दिमाग की बत्ती जलाओ।” 

जब मूल प्रकरण में नोटिस तक नहीं हुआ तो दिल्ली वाली एजेंसी के प्रकरण में गिरफ्तारी और जेल क्यों? न्यायाधीश को एक क्षण भी नहीं लगेगा मामले को कूड़ेदान में फेंकने में। मैंने फिर खबरी को टोका। यार निज़ाम बदल गया है, राजा बदल गया, दरबार भी बदल गया, तो साहब को कोई रोकता-टोकता नहीं है क्या ? 

खबरी ठठाकर हंसा, बेसाख्ता हंसा, हँसता ही रहा। मैं सभीत हिरणी की तरह उसे देखता रहा।उसने पूछा, “ये तुम्हारे जैसे लिखने-पढ़ने वाले इतने कम-अक्ल क्यों होते हैं?" मैं निरुत्तर, चुप और हैरान। किसी तरह अपनी हंसी रोकते हुए आगे उसने कहा कि, निज़ाम आप लोगों के लिए बदलते हैं साहब लोगों के नहीं। सरकार तो साहब की ही है।

अगर कभी ‘वन्स इन अ ब्लू मून’ कोई कष्ट आ भी जाये तो साहब को बस ‘2005-चालीसा’ का पाठ भर करना होता है। इतना करने भर से समस्या जड़मूल से नष्ट हो जाती है। ‘2005 के अधिष्ठाता’ इस समय दरबार में सर्वशक्तिमान हैं।  

“छोटे-मोटे दरबारियों, कलमघिस्सुओं और नेताओं को तो साहब सिर्फ इतना कहकर चलता कर देते हैं कि वो जो कुछ कर रहे हैं, ‘राजा’ यानी ‘नए मुखिया’ की आज्ञा से कर रहे हैं. अब राजा से पूछने की किसकी हिम्मत है बताओ भला?”

इतना कहकर खबरी मेरी मूर्खता पर मंद-मंद मुस्कराता हुआ निज धाम को चल पड़ा और मैं मंदबुद्धि, जड़मति साहब की दहकती सत्यकथा को समझने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ। 

आप कुछ समझे?

(यह कॉलम सरकारी और राजनैतिक गलियारों में चल रही कानाफूसी पर आधारित है. इसमें दी गई जानकारी अनिवार्य रूप से किसी घटना या व्यक्ति से मेल खाए ऐसा जरूरी नहीं है।)

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