चर्चा में कांग्रेस के चमचे

0:00 / 5:25
चर्चा में कांग्रेस के चमचे

अजयभान सिंह  

रायपुर, 5 सितम्बर। नमस्कार, आप शामिल हो चुके हैं 'द वक्ता' की सियासी चर्चा में। आज का मुद्दा है चमचे। आप अपने सुभीते से इसे चमचों की राजनीति या राजनीति के चमचे भी कह सकते हैं। 

इस मुद्दे का सबब है कांग्रेस में अलग-अलग खेमे के नेताओं और उनके समर्थकों के बीच चल रही जूतम-पैजार। दिग्विजय सिंह के ज़माने के मंजे हुए नेता रवींद्र चौबे ने आगाज किया और नेता प्रतिपक्ष डॉ चरणदास महंत ने उस आग में घी डाल कर कांग्रेस में चल रहे महामंथन से चमचा नामक अमृत प्रकट कर दिया। इस किस्से को तफसील से जानने से पहले अपन चमचों की जैव- रासायनिक (बायो केमिकल) अथवा भौतिक संरचना और उसके लक्षणों पर बात कर लें। 

राजनीति में अगर नेता हैं तो चमचे भी उनके आसपास ही फटकते, फुदकते मिल जाते हैं। जबसे सियासत है तबसे चमचे हैं, और ये हमेशा से सियासत और सत्ता के गलियारों की हर चर्चा के केंद्र यानी न्यूक्लियस में रहे हैं। आप इनको नेताओं का ही महीन संस्करण भी कह सकते हैं। यानी जिन तत्वों से मिलकर नेता नामक दुर्लभ पदार्थ का गठन होता है उसमें बहुतायत चमचों या चाटुकारों की ही होती है। जैसे रोटी में बहुतायत आटे की होती है। बिना थके अपने राजनीतिक आकाओं की परिक्रमा करते करते ये इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि आराम से बैठ नहीं सकते। 

ठीक वैसे ही जैसे एक परमाणु के गर्भ में न्यूक्लियस और उसके चारों तरफ धनात्मक आवेश वाले प्रोटॉन, ऋणात्मक आवेश वाले इलेक्ट्रॉन और भारहीन, द्रव्यमान-विहीन फोटोन पाए जाते हैं। नेता भी चारों दिशाओं से भांति भांति के चाटुकारों से घिरा ऐसा फील करता है मानो वह शेषशायी नारायण हो और चारों तरफ छितराए हुए चमचे सहस्र फन वाले शेष नाग हों। जब पूर्ण चंद्र जैसे चमचमाते, चांदी जैसे वर्ण वाले, चतुर, चंट, चालाक, चपल, चंचल चमचे किसी के इर्दगिर्द हों तो वह समस्त लौकिक चिंताओं से मुक्त हो जाता है। 

चमचे राजनीति के बाय-प्रोडक्ट हैं या राजनीति इनका उपकरण है इस पर ठीक-ठीक निर्णय कर पाना काफी जोखिम भरा है। अगर राजनेता में कुटिलता और दुस्साहस कूट कूट के भरा है तो ये तीनों किस्म के चमचे उसकी छत्रछाया में उसके पूरक और सहायक बनकर तेल फुलेलों से युक्त जीवन बसर करते हैं। लेकिन अगर नेता पिता की गद्दी का वारिस बनकर राजनीति कर रहा हो, या अपनी जाति और धर्म के कारण संयोग से वहां पहुंच गया हो तो चमचे और महीन होकर फोटोन बन जाते हैं। और नेता के आभामंडल, उसके आधार और शक्तियों का हरण कर लेते हैं। 

अब जब चर्चा चल ही पड़ी है तो ये भी जान लेते हैं कि फोटोन का चमचों से क्या मेल है? फोटोन भौतिक विज्ञान का वह बिंदु है जहां भौतिकी एक तरह से खत्म होती है और क्वांटम फिजिक्स शुरू होती है। ये फोटोन नाम का कण न तो धनात्मक होता है और न ऋणात्मक। इसका कोई द्रव्यमान यानी भार नहीं होता और यह प्रकाश की गति से चल सकता है। यह टाइम और स्पेस की पारंपरिक व्याख्याओं का अतिक्रमण करता है। कुल मिलाकर यह बिना किसी बाधा के किसी भी दिशा में, किसी भी गति से चलायमान हो जाता है। यानी अंतर्यामी टाइप का हो जाता है। आध्यात्मिकता के अनसुलझे रहस्य भी क्वांटम में छिपे हैं। 

सियासी दृष्टिकोण से कहें तो जो चमचे फोटोन किस्म के होते हैं वह किसी नेता के बंधे नहीं रहते और सत्ता परिवर्तन के साथ ही बड़े आराम से अपने आपको नए निज़ाम के अनुकूल बना लेते हैं। यह अवांतर का विषय है कि कालांतर में यही फोटोन जीवी चमचे निज़ाम को पूरी तरह अपने अनुकूल कर लेते हैं। यह ऐसे इच्छाधारी जीव हैं जो चुटकियों में कहीं भी प्रकट हो सकते हैं। आजकल हम छत्तीसगढ़ के नए निज़ाम में भी इस कोटि के चमचों की एक सुसज्जित सेना रनिवासों के पास मंडराते देख रहे हैं। 

ढिठाई में इनका कोई सानी नहीं है। अपेक्षित हों या नहीं, हर अवसर पर सबसे बड़े नेता के साथ खीसें निपोरते हुए चित्र अवश्य छपना चाहिए। इस कोटि के चमचों की चमक निराली होती है। और धमक ऐसी कि राजनिवासों के छोटे बड़े तमाम सरमायेदार और कारकून उनके इंगित मात्र पर हाथ जोड़े तत्पर खड़े रहते हैं। साम, दाम, दंड, भेद इन्हीं के तरकश के शस्त्र हैं। 

दूसरी कोटि के वो चमचे हैं जो पॉजिटिवली चार्ज्ड यानी धनात्मक आवेश वाले हैं। ये किसी एक नेता की दुम पकड़कर जीवन भर उसी से लटकते रहते हैं। नेता अपने सियासी करियर में जिस तरह से आगे बढ़ता है, हारता है या जीतता है, उसी अनुपात में इन प्रोटॉन जैसे जीवों के जीवन में वासंती बहार आती और जाती रहती है। यूं तो ये भी चाटुरि विद्या से संपन्न श्रेणी है, तथापि कुछ परिमार्जित अर्थों में ऐसे लोगों को आजकल 'लॉयलिस्ट' कहा जाने लगा है। 

तीसरी श्रेणी ऋणात्मक आवेश वाले इलेक्ट्रॉन जैसे उन जीवों की है जो अपने मतलब की सिद्धि ध्येय मानकर किसी नेता के इनर-सर्किल में घुसपैठ करते हैं। सबको मूर्ख बनाते हैं, अपना उल्लू सीधा करते हैं और पतली गली से कट लेते हैं। ऐसे लोग प्रायः दिन में जिन नेताओं की भर्त्सना करते रहते हैं, रात की महफिलों में उन्हीं नेताओं का सजदा करते पाए जाते हैं। 

जिन्होंने 'द मंचूरियन कैंडिडेट' नाम की फिल्म देखी होगी उन्हें अच्छे से याद होगा 'हेनरी सिलवा' का वो ऐतिहासिक किरदार 'चुनजिन' जिसमें उन्होंने खुशामदखोरी यानी चमचागिरी का बहुत ही जीवंत अभिनय किया था। नेता चाहे कितना भी बड़ा हो, चाटुकार उनके अभेद्य से अभेद्य किले को भी भेद लेते हैं और अल्पकाल में उनके प्रिय भी बन जाते हैं। तुलसीबाबा लिख गए है ;

सचिव, बैद, गुरु तीनि जो प्रिय बोलहिं भय आस। 

राज, धर्म, तनु तीनि कर होई बेगही नाश।।

लेकिन जब चाटुकारों के शहद, मिश्री और मलाई से संपृक्त मधुर वचन कर्ण पटल पर पड़ते हैं तो नेता नाम का प्राणी अपनी सुध-बुध खो बैठता है। फिर दुनिया का कोई प्रवचनों उसे रोक नहीं सकता। जैसे सपेरे द्वारा अभिमंत्रित बीन बजाते ही भयानक विषधर खुद ही अपने बिलों से बाहर आ जाते हैं। 

वापस चलते हैं कांग्रेस में चल रहे सृजन नाम के महामंथन की ओर जहां से यह अमृत प्रकट हुआ और एक तरह का देवासुर संग्राम छिड़ गया। देश की सबसे पुरानी, थकी, क्लांत, जर्जर, और हांफती कांग्रेस पार्टी में आजकल नवसृजन के लिए मंथन चल रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बनाम बाकी नेताओं के बीच रस्साकशी, जूतमपैजार चल रही है। दोनों तरफ से समर्थक एक दूसरे पर हमले कर रहे हैं। इन्हीं समर्थकों को पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता चरणदास महंत ने चमचा नाम दिया है। 

इस बवंडर की शुरुआत की चार बार के मंत्री रवींद्र चौबे ने। चौबे ने प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का नाम लिए बगैर कहा कि वर्तमान हालात में भूपेश को पार्टी का नेतृत्व संभालना चाहिए। इसके बाद से दोनों पक्षों में काफी कहासुनी और आरोप प्रत्यारोप जारी हैं। कल एक बैठक में भूपेश और दीपक बैज के समर्थन में दो जिलाध्यक्ष एक दूसरे से भिड़ गए। इसके बाद डॉ महंत ने कहा कि नेताओं को अपने चमचों को संभालना चाहिए। 

चालीस साल से ज्यादा के राजनैतिक अनुभव वाले डॉ महंत ने अगर सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि उनकी पार्टी में नेताओं के अपने अपने चमचे हैं तो हमारे पास शकोशुबहा की गुंजाइश नहीं बचती। यों चमचे सब पार्टियों में होते हैं, लेकिन इस तरह की स्वीकारोक्ति कम ही सुनने को मिलती है। 

बहरहाल, ये देखना दिलचस्प होगा कि चमचों से चमचमाती राजनीति के और कितने रंग हमारी आंखों के सामने नमूदार होंगे। हालांकि चमचा विहीन राजनीति और चमचा मुक्त सिस्टम की कल्पना करना निरी मूर्खता होगी। समाज अब इस सच्चाई के साथ जीना सीख गया है कि धन, शक्ति और सुविधा के हर केंद्र के बाहर चमचों का कड़ा पहरा है और उनको बिना साधे किसी का कल्याण संभव नहीं । 

कमेंट्स

राज्य चुनें

फटाफट खबरें

सभी
देश
दुनिया
मध्यप्रदेश
छत्तीसगढ़
राजनीति
खेल
मनोरंजन
धर्म- ज्योतिष
बत्तीसगढ़
वक्ता की पाती
कानाफूसी
सेहत
स्वाद
लाइफ स्टाइल
कवर स्टोरी/ खुलासा
अतिथि आलेख
जॉब्स / नौकरी
अपराध
संस्कृति
ढाई आखर
प्रेस रिलीज़
चाकरनामा
तकनीक
कारोबार
कानून
पर्यटन
मौसम
रक्षा
योग
सेलिब्रिटी