रायपुर। समाजवादी चिंतक और वरिष्ठ नेता रघु ठाकुर का कहना है कि एक बार फिर भारत की राजनीति ने पाकिस्तान मामले में अपरिपक्वता दिखाई, जबकि सेना ने देश की गरिमा बचा ली।
पहलगाम हमले में 26 निर्दोष पर्यटकों की हत्या के बाद देशभर में गुस्सा था। यह कोई साधारण आतंकी हमला नहीं था — इससे जुड़े आतंकवादी पाकिस्तानी सेना के ही छद्म चेहरे थे। सबूतों के ढेर, पाकिस्तानी हथियारों की मौजूदगी और यहां तक कि पाक सेना द्वारा आतंकियों को सैन्य सम्मान के साथ दफनाने की तस्वीरें, पाकिस्तान की संलिप्तता को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर गईं।
भारत की जनता को उम्मीद थी कि इस बार सरकार कोई निर्णायक कदम उठाएगी। दशकों से चले आ रहे सीमापार आतंकवाद का स्थायी समाधान निकाला जाएगा — खासकर जब इस हमले के पीछे पाकिस्तान की भूमिका इतनी स्पष्ट थी। लेकिन जो हुआ, उसने देश को हतप्रभ कर दिया।
10 मई की शाम अचानक भारत के डीजीएमओ और पाकिस्तान के डीजीएमओ के बीच फोन पर बातचीत होती है, और युद्धविराम की घोषणा हो जाती है। जनता यह सोचती रही कि "मोदी हैं, तो मुमकिन है", लेकिन जो हुआ वह लोगों की उम्मीदों से उलट था।
मोदी सरकार की रणनीति पर सवाल
प्रधानमंत्री मोदी ने पहले तो सख्त लहजे में कहा कि “गोली का जवाब गोले से दिया जाएगा”, लेकिन बाद में सर्वदलीय बैठक से नदारद रहकर और बिना कोई स्पष्ट सार्वजनिक संदेश दिए, वे लोकतांत्रिक परंपराओं से हटते दिखे। दिल्ली में रहते हुए भी सर्वदलीय बैठक में शामिल न होना क्या लोकतंत्र का अपमान नहीं है?
देश की 42% जनता को प्रतिनिधित्व देने वाले एनडीए ने विपक्ष को नजरअंदाज किया, जबकि 58% वोट उस पक्ष में नहीं थे। इसके बावजूद तमाम विपक्षी दलों ने बिना शर्त सरकार और सेना का समर्थन किया — यह भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता का बड़ा उदाहरण था।
क्या अमेरिका का दबाव था?
जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प यह दावा करते हैं कि उन्होंने भारत-पाक के बीच मध्यस्थता की, और कुछ रिपोर्ट्स यह बताती हैं कि अमेरिका ने भारत को व्यापार रोकने की धमकी दी — तो यह साफ होता है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव भी भारत के निर्णय में कहीं न कहीं शामिल रहा होगा।
हालांकि भारत सरकार ने इन दावों का खंडन किया, लेकिन सवाल अब भी हवा में हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा युद्ध के बीच पाकिस्तान को आपातकालीन ऋण देना और भारत का वहां अलग-थलग पड़ जाना — क्या यह किसी दबाव की ओर इशारा नहीं करता?
युद्ध या विश्राम?
भारत सरकार कहती है कि अब अगर हमला हुआ, तो वह युद्ध माना जाएगा। लेकिन फिर 10 मई और 12 मई दोनों दिन ही पाकिस्तान ने संघर्षविराम का उल्लंघन किया। क्या यह वास्तव में युद्धविराम था या सिर्फ रणनीतिक विश्राम? क्या यह प्राचीन युद्धों की तरह है, जहां सेनाएं रात में आराम करती थीं और अगली सुबह फिर युद्ध शुरू होता था?
पीओके को लेकर अधूरी रणनीति
जनता को यह उम्मीद थी कि इस बार भारत, पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) पर निर्णायक कार्रवाई करेगा। क्योंकि आतंकी गतिविधियों का गेटवे पीओके ही है। लेकिन जैसे ही युद्धविराम की खबर आई, यह सवाल उठने लगे कि क्या सरकार ने इस मौके को गंवा दिया?
यदि सरकार का लक्ष्य पीओके वापस लेना था, तो फिर डीजीएमओ स्तर पर युद्धविराम कैसे हो गया? क्या यह सैन्य अधिकारियों द्वारा लिया गया स्वतंत्र निर्णय था, या इसे राजनीतिक नेतृत्व की सहमति प्राप्त थी? अगर यह निर्णय डीजीएमओ का था, तो यह राजनीतिक प्रक्रिया के विपरीत जाकर एक खतरनाक मिसाल बनता है।
मीडिया की भूमिका और भ्रम
भारतीय मीडिया के एक बड़े वर्ग ने दावा किया कि पाकिस्तान बुरी तरह डर गया है, उसके सांसद रो रहे हैं, सेना का प्रमुख गायब है। अगर यह सब सच था, तो फिर सरकार ने पीछे क्यों हटने का फैसला किया?
देश की जनता अब यह जानना चाहती है कि सात दिन चले इस संघर्ष में भारत को क्या मिला? क्या यह 26 निर्दोष लोगों की मौत का बदला था? या केवल सौ आतंकियों को मार गिराना ही रणनीतिक जीत कहलाएगी?
निष्कर्ष: सेना का पराक्रम, राजनीति की कमजोरी
भारत की सेना ने अपना पराक्रम दिखाया, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व उस जीत को रणनीतिक परिणाम में नहीं बदल सका। यही स्थिति 1962, 1965, 1971 और 2001 के बाद अब 2025 में भी दोहराई गई है।
रघु ठाकुर कहते हैं, "सेना जीतती है, राजनीति हारती है — यही इस देश की त्रासदी है।" कूटनीति और विदेश नीति की कमजोरी से हर बार देश पीछे हटता रहा है। आज भी वही हुआ।
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